(एक पत्रकार की नजर से, जहां टेक्नोलॉजी और सच्चाई आमने-सामने हैं)
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब पत्रकारिता का भविष्य नहीं, उसका वर्तमान है। ये न्यूज़रूम में दस्तक दे चुका है। कहीं हेडलाइन सुझा रहा है, कहीं खबरों की भाषा सुधार रहा है और कहीं-कहीं तो पूरी रिपोर्ट भी खुद ही लिख रहा है। ये एक तरफ जहां एक शानदार साथी है, वहीं दूसरी ओर एक संभावित खतरा भी है। इस बदलती दुनिया के बीच खड़ा मैं, AI को सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि हमारे पेशे की आत्मा के लिए एक कसौटी मानता हूं।
हां, AI क्रांतिकारी है। यह रिपोर्टिंग को तेज करता है, रिसर्च में मदद करता है, भारी-भरकम डेटा चंद सेकंड में छान देता है, और जब डेडलाइन सर पर हो तो तेजिंदर खबर भी बना देता है। ये पत्रकारों का बोझ हल्का करता है। लेकिन AI खुद पत्रकार नहीं है। वो न तो किसी आहट को समझ सकता है, न आवाज की थरथराहट को, और न ही किसी युद्ध क्षेत्र की चुप्पी का बोझ महसूस कर सकता है। वो राजनीति की परतों को नहीं पढ़ सकता, न ही किसी हेडलाइन के असर को पहले से भांप सकता है। ये सब इंसानी संवेदनाएं हैं।
कुछ भले ही कहें कि पत्रकारिता खतरे में है, पर मैं अब भी आशावादी हूं। पत्रकारिता खत्म नहीं हो रही, वो खुद को नए सांचे में ढाल रही है। असली संकट तो उन क्षेत्रों में है जो पूरी तरह प्रोसेस आधारित हैं—जैसे IT या बैंकिंग। लेकिन पत्रकारिता दिल और दिमाग से चलती है। जिज्ञासा, अनुभव और निर्णय की भावना से चलती है और ये सब कोई एल्गोरिदम नहीं सीख सकता, न अभी, शायद कभी नहीं।
फिर भी खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शुरुआती स्तर की नौकरियां जैसे सब-एडिटिंग, प्रूफरीडिंग या बेसिक न्यूज कलेक्शन, अब ऑटोमेट हो रही हैं। हर घंटे नई खबर देने का दबाव ऐसा माहौल बना रहा है जहां गहराई से ज्यादा रफ्तार को तवज्जो दी जा रही है। इसी जल्दबाज़ी में सनसनी फैलती है, और नैतिकता की कसौटी कमजोर पड़ने लगती है। अगर AI को बिना निगरानी के इस्तेमाल किया जाए, तो ये हालात और भी बिगड़ सकते हैं।
AI को मदद के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए, सहारा नहीं बनाना चाहिए। इसमें संपादकीय समझ की कमी है। उसे नहीं पता कि कौन सी खबर रोकी जानी चाहिए, कब शब्दों से ज़्यादा चुप्पी जरूरी है। वो सत्ता से सवाल नहीं कर सकता, न ही किसी सूत्र की पहचान की रक्षा कर सकता है। ये काम सिर्फ एक पत्रकार ही कर सकता है। याद रखना ज़रूरी है: AI पत्रकारिता नहीं है। ये एक औज़ार हो सकता है, लेकिन इंसान की ईमानदारी की जगह नहीं ले सकता।
आजकल न्यूज़रूम में एल्गोरिदम, ट्रेंडिंग कंटेंट और "क्या वायरल होगा" का बोलबाला है। छोटे वीडियो, रील्स ये खबर को तेजी से दिखा सकते हैं, लेकिन गहराई से समझा नहीं सकते। स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए खबरें आंखों से तो गुजरती हैं, लेकिन दिमाग तक नहीं पहुंचतीं। हां, लोग लगातार देखते हैं, पर असली जुड़ाव अब भी अच्छी क्वालिटी पर ही निर्भर करता है, मात्रा पर नहीं।
AI का स्याह पक्ष भी है। इसे प्रोपेगेंडा फैलाने, बॉट्स से कमेंट भरने और टार्गेटेड नैरेटिव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ये अनजाने में गलत या भ्रामक जानकारी फैला सकता है, क्योंकि मशीन सच को इंसान की तरह नहीं समझती। और अगर गलती हो जाए, तो जिम्मेदारी कौन लेगा—AI या उसे इस्तेमाल करने वाला पत्रकार?
इसीलिए पारदर्शिता जरूरी है। AI का इस्तेमाल सही तरीके से, संपादकीय निगरानी में होना चाहिए। जब मशीन काम करे तब भी जवाबदेही इंसान की ही होगी। डेटा में छिपे पूर्वाग्रह, संदर्भ की कमी या किसी आउटपुट की गलती—इन सबकी जांच और सुधार इंसान ही कर सकता है। जैसे पहले था, आज भी सच सबसे ऊपर है। हमारा काम सिर्फ सच तक पहुंचना नहीं, बल्कि उसे बचाए रखना भी है।
और सबसे जरूरी बात कोई भी AI न सत्ता से जवाब मांग सकता है, न गलती के लिए माफी मांग सकता है, और न ही जनता का भरोसा जीत सकता है। ये सिर्फ एक पत्रकार ही कर सकता है।
तो अब आगे क्या हो सकता है? हमें पत्रकारिता को छोड़ना नहीं है, उसे नया रूप देना है। AI को सहायक बनाएं, उसकी ताकत का इस्तेमाल करें जैसे रिकॉर्ड खंगालना, ट्रेंड्स को समझना, शुरुआती ड्राफ्ट तैयार करना लेकिन असली कहानी में जान इंसान ही डालेगा। हमें उन चीज़ों पर ध्यान देना होगा जो मशीन कभी नहीं कर सकती जैसे संवेदनशीलता, ज़िम्मेदारी और नैतिकता।
और सबसे अहम बात ये है कि हमें रफ्तार और गहराई के बीच फर्क समझना होगा। जो क्लिक हो जाए, और जो भरोसा जीत ले इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर होता है क्योंकि पत्रकारिता का अस्तित्व सिर्फ तकनीक पर नहीं, भरोसे पर टिका है।
अंत में ये विचार सारगर्भित है कि हमें AI से डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन उसका इस्तेमाल करते वक्त ये कभी मत भूलिए कि हम कौन हैं।
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