बुधवार, 21 जनवरी 2026

विशेष आर्थिक क्षेत्र

( 2006 में लिखा गया आलेख जब पत्रकारिता का कोर्स जारी था) 



'विशेष औद्योगिक क्षेत्र' ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों को कहा जाता है तो निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उदार आर्थिक नीतियों और उत्तम ढांचागत सुविधाओं से संपन्न होते है। यह क्षेत्र आमतौर पर नियातोन्मुखी होते हैं और जिनमें देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए खास क्षमता होती है। सरकार द्वारा निर्धारित करों में कई प्रकार की छूट दी जाती है और आवश्यकतानुसार श्रम कानू‌नों में भी ढील दी जाती है। चीन के विशेष आर्थिक क्षेत्रों से प्रेरणा लेकर, 1 अप्रैल 2000 से प्रभावी एग्जिम नीति में 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' योजना लागू‌ की गई। सरकार ने पूर्व के सभी 8 निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों- कांडला और सूरत (गुजरात) सांताक्रूज (महाराष्ट्र), कोच्चि (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु) नोएडा (उतर प्रदेश) फाल्टा (प. बंगाल) और विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) को सेज में परिवर्तित कर दिया। 23 जून 2005 को संसद ने 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' को विधेयक पारित कर कानून बना दिया तथा 10 फरवरी 2006 से विशेष आर्थिक जोन अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम के तहत SEZ में स्थापित इकाईयों के लिए एकल खिड़‌की से सभी प्रकार की स्वीकृति प्राप्त हो सकेगी। साथ ही, इन इकाइयों को विभिन्न प्रकार की छूटे प्रदान की गई है तथा ऑफशोर बैंकिंग इकाइयों की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है। इस अधिनियम के अन्तर्गत जारी नियमावली के अनुसार यथासंभव अनुपजाऊ और बंजर भूमि का उपयोग करते हुए कम से कम 10 हेक्टेयर (24 एकड़) पर सॉफ्टवेयर तथा बायोटेक्नोलॉजी जैसे छोटे व्यवसायों को तथा अधिकतम 1000 हेक्टेयर भूमि पर बहुउत्पाद उद्योगों और व्यावसायों को आवासीय क्षेत्र, अस्पताल, शॉपिंग सेंटर तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था के साथ भी सम्मिलित एक या कई उद्यमियों द्वारा समिालित रूप से विकसित किए जाने के प्रावधान रखे गये है। इस अधिनियम के अन्तर्गत किसी भी निजी, सार्वजनिक तथा संयुक्त क्षेत्र द्वारा SEZ की स्थापना की जा सकती है। विदेशी कंपनियों को भी SEZ स्थापित करने की छूट है। इस हेतु इन्हें 100 प्रतिशत तक FDI की छूट दी गई है। वाणिज्य मंत्री के अनुसार आगामी तीन वर्षों (2016-09) के दौरान 1 लाख करोड़ रुपये का निवेश इन क्षेत्रो से अपेक्षित है, जिससे रोजगार के 5 लाख अवसर सृजित हो सकेंगे। सितम्बर 2006 तक सरकार ने कुल मिलाकर 267 SEZ को स्वीकृति दी जिनमें से 130 को औपचारिक तथा 117 को सैद्धांतिक तौर पर स्वीकृति दी गयी है। इनको स्थापित करने से पहले सरकार, स्थापन कर्ता तथा भूमिवासी के बीच एक समझ कायम होना ही इसको एक मजबूत आधार देता है।

शनिवार, 26 जुलाई 2025

AI के दौर में पत्रकारिता का नया चेहरा

 


(एक पत्रकार की नजर से, जहां टेक्नोलॉजी और सच्चाई आमने-सामने हैं)


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब पत्रकारिता का भविष्य नहीं, उसका वर्तमान है। ये न्यूज़रूम में दस्तक दे चुका है। कहीं हेडलाइन सुझा रहा है, कहीं खबरों की भाषा सुधार रहा है और कहीं-कहीं तो पूरी रिपोर्ट भी खुद ही लिख रहा है। ये एक तरफ जहां एक शानदार साथी है, वहीं दूसरी ओर एक संभावित खतरा भी है। इस बदलती दुनिया के बीच खड़ा मैं, AI को सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि हमारे पेशे की आत्मा के लिए एक कसौटी मानता हूं।


हां, AI क्रांतिकारी है। यह रिपोर्टिंग को तेज करता है, रिसर्च में मदद करता है, भारी-भरकम डेटा चंद सेकंड में छान देता है, और जब डेडलाइन सर पर हो तो तेजिंदर खबर भी बना देता है। ये पत्रकारों का बोझ हल्का करता है। लेकिन AI खुद पत्रकार नहीं है। वो न तो किसी आहट को समझ सकता है, न आवाज की थरथराहट को, और न ही किसी युद्ध क्षेत्र की चुप्पी का बोझ महसूस कर सकता है। वो राजनीति की परतों को नहीं पढ़ सकता, न ही किसी हेडलाइन के असर को पहले से भांप सकता है। ये सब इंसानी संवेदनाएं हैं।


कुछ भले ही कहें कि पत्रकारिता खतरे में है, पर मैं अब भी आशावादी हूं। पत्रकारिता खत्म नहीं हो रही, वो खुद को नए सांचे में ढाल रही है। असली संकट तो उन क्षेत्रों में है जो पूरी तरह प्रोसेस आधारित हैं—जैसे IT या बैंकिंग। लेकिन पत्रकारिता दिल और दिमाग से चलती है। जिज्ञासा, अनुभव और निर्णय की भावना से चलती है और ये सब कोई एल्गोरिदम नहीं सीख सकता, न अभी, शायद कभी नहीं।


फिर भी खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शुरुआती स्तर की नौकरियां जैसे सब-एडिटिंग, प्रूफरीडिंग या बेसिक न्यूज कलेक्शन, अब ऑटोमेट हो रही हैं। हर घंटे नई खबर देने का दबाव ऐसा माहौल बना रहा है जहां गहराई से ज्यादा रफ्तार को तवज्जो दी जा रही है। इसी जल्दबाज़ी में सनसनी फैलती है, और नैतिकता की कसौटी कमजोर पड़ने लगती है। अगर AI को बिना निगरानी के इस्तेमाल किया जाए, तो ये हालात और भी बिगड़ सकते हैं।


AI को मदद के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए, सहारा  नहीं बनाना चाहिए। इसमें संपादकीय समझ की कमी है। उसे नहीं पता कि कौन सी खबर रोकी जानी चाहिए, कब शब्दों से ज़्यादा चुप्पी जरूरी है। वो सत्ता से सवाल नहीं कर सकता, न ही किसी सूत्र की पहचान की रक्षा कर सकता है। ये काम सिर्फ एक पत्रकार ही कर सकता है। याद रखना ज़रूरी है: AI पत्रकारिता नहीं है। ये एक औज़ार हो सकता है, लेकिन इंसान की ईमानदारी की जगह नहीं ले सकता।


आजकल न्यूज़रूम में एल्गोरिदम, ट्रेंडिंग कंटेंट और "क्या वायरल होगा" का बोलबाला है। छोटे वीडियो, रील्स ये खबर को तेजी से दिखा सकते हैं, लेकिन गहराई से समझा नहीं सकते। स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए खबरें आंखों से तो गुजरती हैं, लेकिन दिमाग तक नहीं पहुंचतीं। हां, लोग लगातार देखते हैं, पर असली जुड़ाव अब भी अच्छी क्वालिटी पर ही निर्भर करता है, मात्रा पर नहीं।


AI का स्याह पक्ष भी है। इसे प्रोपेगेंडा फैलाने, बॉट्स से कमेंट भरने और टार्गेटेड नैरेटिव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ये अनजाने में गलत या भ्रामक जानकारी फैला सकता है, क्योंकि मशीन सच को इंसान की तरह नहीं समझती। और अगर गलती हो जाए, तो जिम्मेदारी कौन लेगा—AI या उसे इस्तेमाल करने वाला पत्रकार?


इसीलिए पारदर्शिता जरूरी है। AI का इस्तेमाल सही तरीके से, संपादकीय निगरानी में होना चाहिए। जब मशीन काम करे तब भी जवाबदेही इंसान की ही होगी। डेटा में छिपे पूर्वाग्रह, संदर्भ की कमी या किसी आउटपुट की गलती—इन सबकी जांच और सुधार इंसान ही कर सकता है। जैसे पहले था, आज भी सच सबसे ऊपर है। हमारा काम सिर्फ सच तक पहुंचना नहीं, बल्कि उसे बचाए रखना भी है।


और सबसे जरूरी बात कोई भी AI न सत्ता से जवाब मांग सकता है, न गलती के लिए माफी मांग सकता है, और न ही जनता का भरोसा जीत सकता है। ये सिर्फ एक पत्रकार ही कर सकता है।


तो अब आगे क्या हो सकता है? हमें पत्रकारिता को छोड़ना नहीं है, उसे नया रूप देना है। AI को सहायक बनाएं, उसकी ताकत का इस्तेमाल करें जैसे रिकॉर्ड खंगालना, ट्रेंड्स को समझना, शुरुआती ड्राफ्ट तैयार करना लेकिन असली कहानी में जान इंसान ही डालेगा। हमें उन चीज़ों पर ध्यान देना होगा जो मशीन कभी नहीं कर सकती जैसे संवेदनशीलता, ज़िम्मेदारी और नैतिकता।


और सबसे अहम बात ये है कि हमें रफ्तार और गहराई के बीच फर्क समझना होगा। जो क्लिक हो जाए, और जो भरोसा जीत ले इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर होता है क्योंकि पत्रकारिता का अस्तित्व सिर्फ तकनीक पर नहीं, भरोसे पर टिका है।


अंत में ये विचार सारगर्भित है कि हमें AI से डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन उसका इस्तेमाल करते वक्त ये कभी मत भूलिए कि हम कौन हैं।

Reinventing Journalism in the Age of AI

 

(By a journalist reflecting on the crossroads of technology and truth)


Artificial Intelligence in journalism is no longer a concept of the future. It is here-buzzing in newsrooms, editing lines, recommending headlines, and sometimes even writing entire stories. It’s both a remarkable ally and a potential disruptor. And as someone within the heart of this evolving industry, I see AI not just as a tool, but as a test of our profession’s soul.


Yes, AI is revolutionary. It accelerates reporting, supports research, sifts through vast datasets in seconds, and even drafts quick news blurbs when deadlines are breathing down your neck. It helps reduce the grunt work for journalists. But AI is not a journalist. It cannot feel the nuance in a sigh, the tremble in a voice, or the weight of silence in a war zone. It cannot read between political lines or predict the ripple effect of a headline. That remains firmly human.


Despite what some headlines scream, I remain optimistic. Journalism is not dying. It is adapting. In fact, the real existential crises lie elsewhere, in IT and in banking, industries more mechanical and process-driven. Journalism, by contrast, thrives on human curiosity, instinct, and judgement. These can’t be encoded in an algorithm... not yet, and maybe never.


Still, we can’t pretend there’s no threat. Entry-level roles like sub-editing, proofreading, or basic news aggregation are increasingly automated. The pressure to churn out fresh content every hour has created a culture of speed over depth. In this rush, sensationalism creeps in. Ethics are tested. And AI, when unchecked, only intensifies this.


There’s a real danger in using AI as a crutch rather than a companion. It lacks editorial judgement. It doesn’t know when a story shouldn’t be published. It cannot question power or protect a source. These are core duties of a journalist. We must remember: AI is not journalism. Tools may assist, but they do not replace integrity.


In the modern newsroom, there’s growing reliance on algorithms, content trends, and "what will go viral." Shorts and reels break the news faster than bulletins ever could, but they rarely break it down. Depth and context get lost in the scroll. People binge-watch, yes, but meaningful engagement still depends on quality, not quantity.


There are darker sides too. AI can be manipulated to generate propaganda, flood comments with bots, or micro-target polarized narratives. It can unintentionally spread misinformation, simply because it doesn’t understand truth the way humans do. And if AI makes a mistake, who’s responsible—the machine or the journalist who used it?


This is where transparency becomes non-negotiable. AI must be used ethically, with editorial oversight. Journalists must be held accountable, even when a machine is involved. Bias in training data, lack of context, or errors in output must all be traced, checked, and corrected. As always, facts are sacred. Our job is not just to chase them but to protect them.


Let’s also be clear: no AI can hold power to account, apologize for an error, or earn public trust. Only a human journalist can do that.


So where do we go from here?


We must reinvent journalism, not surrender it. Use AI to assist reporting, not replace it. Let it do the heavy lifting like scanning records, analyzing trends, drafting base copy but let humans bring the story to life. Let us focus on what machines can't replicate: instinct, empathy, accountability.


Most importantly, we must draw a line between speed and substance. Between what is clickable and what is credible. Because the survival of journalism isn’t just about technology, it’s about trust.


Final thought: We shouldn’t fear AI. But we must never forget who we are in the process of using it.

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

क्रिकेट विश्व कप फिर से ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में

23 साल बाद क्रिकेट विश्व कप का आयोजन ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में फिर से होने जा रहा है। 1992 में जब पहली बार दक्षिणी गोलार्द्ध में क्रिकेट विश्व कप का आयोजन हुआ था, तो काफी चीज पहली बार हो रही थी। पहली बार रंगीन कपड़ों में क्रिकेट टीमों का मैदान पर आना, उजले क्रिकेट बॉल और काले साइडस्क्रीन का प्रयोग होना- इस विश्व कप के खास आकर्षणों में से था। फ्लड लाइट की दूधिया रोशनी में मैचों का आयोजन होना और फील्डींग रेस्ट्रीकशन का लगना भी पहली बार विश्व कप में हुआ था। एक नई टीम दक्षिण अफ्रीका का उस वक्त एक लंबे अंतराल के बाद आना- अजीबोगरीब लगा था, लेकिन इस नई टीम ने आने के साथ अपने शानदार प्रदर्शन से विश्व कप में बड़ी-बड़ी टीमों को बुरी तरह से डरा दिया था। सेमीफाइनल में बारिश के कारण 13 गेंद में 22 रन के बदले मिले नए लक्ष्य 1 गेंद में 21 रन ने जहां दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट प्रेमियों को निराश किया वहीं एक नए नियम की ओर सोचने के लिए मजबूर किया, तब जाकर कहीं डकवर्थ-लुईस नियम का जन्म हुआ।

अपने कई नए अनोखे प्रयोगों के कारण 1992 के विश्व कप ने क्रिकेट प्रेमियों को अपनी ओर खींचा था, वहीं 2015 में होने वाले विश्व कप पर क्रिकेट प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करने का खासा दबाब रहेगा। 23 साल में परिस्थितियां काफी बदली है। अब टी-20 विश्व कप, आईपीएल और ऐसी ही कितनी क्लब प्रतियोगिताओं ने दर्शकों को अपनी ओर खींचा हैं। दर्शकों को तीन घंटे में मैच का परिणाम देखने को मिल जाता है। कुछ नए नियम, कुछ नए प्रवर्तन ही विश्व कप को रोचक बना सकते है।

1992 विश्व कप प्रतियोगिता में पहली बार न्यूजीलैंड ने जहां स्पिनर से गेंदबाजी का आगाज करवाया, वहीं सलामी बल्लेबाज के द्वारा आतिशी खेल की शुरूआत की नींव भी इसी विश्व कप में मार्क ग्रेटबैच के द्वारा रखी गई। न्यूजीलैंड के सलामी बल्लेबाज के रूप मिले मौके को मार्क ग्रेटबैच ने काफी भुनाया।


विश्व कप में पहली बार राउंड रॉबिन लीग को हटाकर लीग राउंड में सभी देशों को एक-दूसरे से भिड़ना पड़ा। जिसका खामियाजा अच्छी टीमें को भुगतना पड़ा और अंततः पाकिस्तान चैंपियन बनकर उभरा।
 

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

अच्छे दिन कब आयेंगे....

' परिवर्तन संसार का नियम है ' - सुनते रहे है बचपन से, और देखते भी। महसूस करना  भी इसी कड़ी का हिस्सा है। पिछले तीन महीनों में सभी स्तरों पर काफी परिवर्तन आया है। सबसे पहले तो देश में सत्ता का परिवर्तन हुआ। 'अच्छे दिन' लाने वाले चुके है। ' अबकी बार, मोदी सरकार' का नारा लगाने वाले मोदी सरकार बनते देख चुके है। महंगाई, भ्रष्टाचार से तंग चुकी जनता ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को चलता किया और उसकी जगह भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता में ला दिया। देखने में ये बाहरी बदलाव लग रहा है, लेकिन बदल कुछ नहीं रहा है। महंगाई जस की तस बनीं हुई है। नई सरकार कहती है- पुरानी सरकार ने इन नीतियों को हरी झंडी दे दी थी, सो हम लागू कर रहे है। कल पेश हुए रेल बजट में भी कोई खास दम नहीं था। किराया भाड़ा 28 जून को ही बढ़ा दिया गया था, सो ये भाड़ा- इस बजट का हिस्सा नहीं बन सका। एक तरह से केंद्र में भाजपा की सरकार- कांग्रेस सरकार की स्थानापन्न है। खैर, इतनी जल्दी अच्छे दिन की उम्मीद करना भी बेमानी होगी। अभी आम बजट भी पेश होेने वाला है। महंगाई और भ्रष्टाचार से पहले ही अर्थव्यस्था पूरी तरह से टूटी हुई है। इसे पटरी पर लाने के लिए बिटर पिल्स की जरूरत है, और इस बिटर पिल्स को खाएगा कौन? आम जनता। और इस पर ऐश कौन करेगा- ये जनता भलीभांति जानती है। जनता ये भी जानती है, हर हाल में उसे ही महंगाई का बोझ सहना है, हर हाल में उसे ही भुगतना है। उसके लिए कोई परिवर्तन नहीं आया है। पहले भी महंगाई थी, अब भी महंगाई है। किसी ना किसी रूप में आम जनता को अपना जीवन जीना है, ये संसार में उसके रहने का नियम है। भले परिवर्तन हो या ना हो- अपना अस्तित्व बनाए ऱखने के लिए आम जनता को मेहनत करना पड़ता है- ये संसार का नियम है। (0211)

रविवार, 23 मार्च 2014

दो साल में हुए नक्सली हमले

-- 11 मार्च 2014: छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की जिरम घाटी में माओवादी हमले में 15 जवानशहीद हुए जवानों में 11 सीआरपीएफ के और चार राज्य पुलिस के जवान हैं। इनके अलावा एक स्थानीय नागरिक की भी मौत हुई है।
-- 28 फरवरी 2014:  छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सली मुठभेड़ में 6 पुलिसकर्मी शहीद

-- 9 फरवरी 2014: छत्तीसगढ़ के सुकमा में बारूदी सुरंग हमले में सीआरपीएफ के दो अधिकारी शहीद और 12 जवान घायल

-- 25 मई 2013 : छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों के कांग्रेस के परिवर्तन यात्रा पर हमले में कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल समेत 25 लोगों की मौत, 19 अन्य घायल

-- 18 मई 2013: छत्तीसगढ़ के बीजापुर में एक मुठभेड़ में एक जवान और 8 ग्रामीणों की मौत

-- 12 मई 2013: छत्तीसगढ़ में जगदलपुर में दूरदर्शन केंद्र पर हमले में 3 पुलिसकर्मी शहीद

-- 18 अक्टूबर 2012: बिहार के गया जिले में बारूदी सुरंग हमले और गोलीबारी में सीआरपीएफ के 6 जवान शहीद और डिप्टी कमांडेंट सहित 8 पुलिसकर्मी घायल

-- 13 मई 2012: छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम के संयंत्र के पास नक्सली मुठभेड़ में सीआईएसएफ के 6 जवान शहीद

-- 21 अप्रैल 2012:  छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कलेक्टर के अपहरण के दौरान 2 पुलिसकर्मी शहीद

-- 20 अप्रैल 2012: छत्तीसगढ़ के बीजापुर में बारूदी सुरंग धमाके में तीन लोगों की मौत, भाजपा विधायक और कलेक्टर बाल-बाल बचे

-- 14 मार्च 2012: छत्तीसगढ़ के कांकेड़ में बारूदी सुरंग धमाके में सीमा सुरक्षा बल के 4 जवान

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

वापस आ रहा हूं..

न जाने २०११ में क्यूं कुछ लिख ना सका, इस साल २०१२ में बहुत बातें कहनी है, करनी है अपने इस निशब्द के माध्यम से...