बुधवार, 11 मार्च 2026

रूस-यूक्रेन संघर्ष और पीएम मोदी

 

Vo 1 TW EFFECT …24 फरवरी 2022 (over all dramatic)

 < यूक्रेन हुआ बर्बाद और पस्त – कीव पर हमला – युद्ध ने पश्चिम और बाकी दुनिया को पूरी तरह से बांटा >

 

2022 का फरवरी महीना.... रूस-यूक्रेन युद्ध पूरी दुनिया की सुर्खियों में छाया रहा... यूक्रेन के पांव उखड़ने लगे। रूस के हमले से दोनों देशों को काफी नुकसान हुआ। सामने आया यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट। यूक्रेन के करीब 75 लाख लोगों को देश छोड़ना पड़ा। रूस को भी सबसे बड़े प्रवासी संकट का सामना करना पड़ा। जंग के कारण विश्व को खाद्य संकट का सामना करना पड़ा।

.(ambience / sound/ clashes)

आने वाले महीनों में रूस और यूक्रेन के बीच शुरु हुई जंग पूरे तरह से युद्ध में बदल गई। दुनिया दो धड़ों में बंट गई। सात महीने से ज्यादा का समय हो गया... लेकिन युद्ध के खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। (WAR SHOTS / AMBIENCE BREAK)

 

 

Vo2 (latest)

रूस ने युद्ध में अपने कब्जे में लिए हुए दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसोन और ज़ापोरिज़्ज़िया (map location alpha) का जनमत संग्रह कर विलय कर लिया। पश्चिमी देशों ने इस कदम की व्यापक निंदा की। रूस और यूक्रेन के बीच रूस और पश्चिमी देशों के बीच हमले और जवाबी हमले बेरोकटोक जारी है। रूस के खिलाफ खासतौर पर अमेरिका और उसके सहयोगी देश खड़े हैं। युद्ध वाले इलाकों में रूस और यूक्रेन के नक्शे हर सेकंड बदल रहे हैं और दोनों देशों के तरफ से हमले कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। 7 महीने से ज्यादा का समय हो गया है। युद्ध ने दुनिया को परोक्ष रुप में बांट दिया और गुटों में राजनीति होने लगी। प्रमुख शक्तियों ने खुले तौर पर किसी न किसी के पक्ष में आ गई।

Byte expert

 

युद्ध की विभीषिका/ खत्म होने का कोई नाम नहीं

 

 

VO3 < यूक्रेन और रूस से भारत कर रहा शांति की वकालत

 

 

<-VO SLUG  वैश्विक मंचों पर पीएम की शांति की वकालत >

 

पहले हमले के 48 घंटे के भीतर यूक्रेन ने भारत का दरवाजा खटखटाया... हस्तक्षेप करने की मांग की... एक तरह से मध्यस्थता करने की बात की... यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत के प्रधानमंत्री से बात की।   

 

UKRAINE ENVOY PC BYTE (FEB END )

 

Zelensky shots with PM FILE

युद्ध के पहले दिन से ही भारत ने सीधे तौर पर मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभाई। लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच की खाई को कम करने की कोशिश की। प्रधानमंत्री मोदी ने कई मौकों पर रूस के राष्ट्रपति और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से बात की। दोनों से बातचीत चालू रखने और संघर्षविराम करने को कहा। साथ ही युद्ध को तुरंत खत्म करने को भी कहा। ये बातचीत अभी भी जारी है। भारत ने शुरु से ही बिना पक्ष लिए हुए युद्ध खत्म करने को कहा। भारत को जो उचित लगा उसने वैसा ही किया।

 

 

Bridge 1.

भारत कैसे अपने रूख पर कायम रहा

 

जब यूक्रेन युद्ध से जूझ रहा था तो अंतर्राष्ट्रीय मीडिया जगत के कुछ वर्गों और कुछ राजनयिक हलकों में अलग तरह का खेल चल रहा था। भारत के तटस्थ होने या कुछ के अनुसार पक्ष नहीं लेने पर सवाल उठाए जा रहे थे। कुछ पश्चिमी देशों ने रूस के यूक्रेन पर हमले को लेकर भारत के रूख पर नाखुशी जताई। कुछ ने तो अपने हिसाब से इसे निंदा करने से इंकार बताया। भारत विरोधी लॉबी ने तो एक बार फिर रूस-यूक्रेन पर भारत की गरिमापूर्ण और संतुलित पक्ष रखने के मुद्दे को उछाला। भारत ने किसी गुट का हिस्सा न बनकर कईयों को खामोश कर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध के पहले दिन से भारत अपने रूख पर कायम रहा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

SLUG  < विश्व पटल पर पीएम मोदी की शांति की वकालत >

 

TW EFFECT – 16 सितंबर 2022, एससीओ शिखर सम्मेलन

 

VO4

 

उज्बेकिस्तान में एससीओ सम्मेलन से इतर, प्रधानमंत्री मोदी ने अपना रूख साफ रखा... उन्होंने फिर दोहराया कि लोकतंत्र, कूटनीति एवं संवाद पूरे विश्व के लिए अहम है- ये सीधे तौर पर पुतिन के लिए कही गई थी।

 

Byte

 

मुझे यूक्रेन में संघर्ष पर आपकी स्थिति के बारे में पता है, और मुझे आपकी चिंताओं के बारे में पता है। हम चाहते हैं कि यह सब जल्द से जल्द खत्म हो.

 

VO-

 

रूस-यूक्रेन संघर्ष का सीधे तौर पर जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति से साफ कहा और उन्हें बताया कि आज का युग युद्ध का नहीं है और ये प्राथमिकता तय करने का समय है।

 

Byte

मैं जानता हूं कि आज का युग युद्ध का युग नहीं है हमने फोन पर भी कई बार इस मसले पर आपसे बात की है।,”

 

पुतिन ने कहा कि वे यूक्रेन युद्ध को लेकर मोदी की चिंताओं को समझते हैं।

 

 

  < SLUG  TW EFFECT क्वाड शिखर सम्मेलन 3 मार्च 2022 >

 

VO5

एक और वैश्विक मंच, यूक्रेन मुद्दे का वार्ता के जरिए समाधान के लिए एक और बार जोरदार वकालत।

क्वाड देशों के शीर्ष नेतृत्व में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, तत्कालीन आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मारिसन और जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा शामिल.... यूक्रेन के घटनाक्रम पर चर्चा की गई... इसके मानवीय परिणामों पर भी चर्चा हुई।  

 

 

SLUG < 1 मार्च 2022: पीएम ने यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष से की बात >

 

Vo 6-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूरोपीय परिषद से पहले संपर्क करने वाले कुछ विश्व नेताओं में से एक थे। उन्होंने यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल से फोन पर बात की। प्रधानमंत्री ने यूक्रेन में बिगड़ती स्थिति और मानवीय संकट पर अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने दुश्मनी को खत्म करने और फिर से वार्ता करने की भारत की अपील को दोहराया। (Mitchel shots / European council)

 

Vo 7

B : पीएम ने युद्ध रोकने के लिए दुनिया से की बात

 

प्रधानमंत्री मोदी के रूस-यूक्रेन तनाव को कम करने के प्रयास दोनों युद्ध में लगे देशों तक सीमित नहीं थे। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की दुश्मनी खत्म करने और कूटनीति और वार्ता के जरिए सुलझाने की अपील को बार-बार दोहराया। साथ ही रूस और यूक्रेन के पड़ोसी देशों के भी बातचीत की। जंग में फंसे भारतीयों की निकासी के लिए सुरक्षित रास्ता देने के लिए रूस-यूक्रेन के पड़ोसी देशों से बात की।

 

(alpha gfx) पीएम मोदी ने हंगरी के प्रधानमंत्री मार्क रट्ट, नीदरलैंड के प्रधानमंत्री से बाती की। प्रधानमंत्री ने पोलैंड के राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा से भी फोन पर बात की।  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ फोन पर बात की। प्रधानमंत्री मोदी ने स्लोवाक गणराज्य के प्रधानमंत्री एडुआर्ड हेगर से फोन पर बात की। प्रधानमंत्री मोदी ने रोमानिया के प्रधानमंत्री निकोले-इओनेल सियुको से फोन पर बात की। उन्होंने भारतीय नागरिकों को बिना वीजा के रोमानिया में प्रवेश करने और भारत से विशेष निकासी उड़ानों की अनुमति देने में रोमानिया के कदम की सराहना की।

 

 

BRIDGE 2

< भारत ने गुटबाजी करने से किया इंकार >

 

भारत ने गुटबाजी न कर अपनी हितों को प्राथमिकता दी। वैश्विक स्तर पर हो रहे भारी उथल-पुथल के बीच भारत जैसे बड़े और कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई थी। और उससे भी ज्यादा बड़ी प्रधानमंत्री मोदी की अंतर्राष्ट्रीय साख थी। रूस की निंदा करने से भारत के इंकार जैसे फेक नैरेटिव को बुरी तरह खारिज कर दिया गया। 

 

 

 

 

VO8 slug < भारत गुटबाजी का हिस्सा नहीं बना >

जब यूक्रेन युद्ध से जूझ रहा था तो अंतर्राष्ट्रीय मीडिया जगत के कुछ वर्गों और कुछ राजनयिक हलकों में अलग तरह का खेल चल रहा था। भारत के तटस्थ होने या कुछ के अनुसार पक्ष नहीं लेने पर सवाल उठाए जा रहे थे। कुछ पश्चिमी देशों ने रूस के यूक्रेन पर हमले को लेकर भारत के रूख पर नाखुशी जताई। कुछ ने तो अपने हिसाब से इसे निंदा करने से इंकार बताया। भारत विरोधी लॉबी ने तो एक बार फिर रूस-यूक्रेन पर भारत की गरिमापूर्ण और संतुलित पक्ष रखने के मुद्दे को उछाला। भारत ने किसी गुट का हिस्सा न बनकर कईयों को खामोश कर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध के पहले दिन से भारत अपने रूख पर कायम रहा।

 

 

Byte expert

 

 

 < इस मुद्दे पर पीएम मोदी की सराहना/ पीएम मोदी भारत – वैश्विक कूटनीति के केंद्रबिंदु  > 

 

VO SLUG TW EFFECT  27 सितंबर 2022

 

VO 9:

 

जब भी प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध को रोकने की बात की या रूस-यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने और शांति कायम करने पर अपने मन की बात रखी.... तो दुनिया ने उनको सुना। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने प्रधानमंत्री मोदी की शांति की वकालत वाली बात का जोरदार समर्थन किया।

 

BYTE- एंटनी ब्लिंकन

( मोदी द्वारा पुतिन को कही गई बात से हम पूरी तरह सहमत है। )

 

 

TW EFFECT 1: 21 सितंबर 2022: ब्रिटेन के विदेश मंत्री ने पीएम मोदी की प्रशंसा की

 

VO 10- ब्रिटेन के विदेश मंत्री जेम्स क्लेवरली ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व मंच पर प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखने के लिए पहचाना जाता है और रूसी नेतृत्व भी वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति का सम्मान करता है। 

 

VO 11- फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पीएम मोदी की तारीफ की और कहा कि वे सही थे जब उन्होंने कहा कि ये समय युद्ध का नहीं है।

 

BYTE MACRON

" भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सही कहा था कि यह समय युद्ध का नहीं है। यह पश्चिम से बदला लेने का समय नहीं है, या पूर्व के खिलाफ पश्चिम के विरोध का समय नहीं है। आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए यह हमारे संप्रभु समान  देशों के साथ आने का समय है। ताकि हम हमारे सामने आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकें।उन्होंने ये बात न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 77वें सत्र में कही।

 

VO12

TW EFFECT :20 सितंबर 2022

 

 

VO-

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के बयान की तारीफ की और कहा ये बयान 'सिद्धांतों पर आधारित था जिन्हें वह सही और न्यायोचित मानते हैं और अमेरिका उसका स्वागत करता है।

 

" मैं मानता हूं कि जो प्रधानमंत्री मोदी ने कहा  वह 'सिद्धांतों पर आधारित था जिन्हें वे सही और न्यायोचित मानते हैं तथा अमेरिका इसका स्वागत करता है और भारतीय नेता की यह टिप्पणी सराहनीय है, जिससे रूस को यह संदेश दिया गया है कि अब युद्ध समाप्त होने का समय आ गया है।व्हाइट हाउस द्वारा जारी बयान में उन्होंने ये बात कही।

 

 

 

VO13 TW EFFECT < मार्च 2022 ऑपरेशन गंगा.... पैनिक बटन- निकासी अभियान- ऑपरेशन गंगा>

 

 

यूक्रेन संकट से दुनिया की स्थिति ज्यादा बिगड़ने लगी.... ऐसे में दुनिया की प्रमुख शक्तियों ने सभी देशों से अपना रूख साफ करने को कहा। भारत ने उस समय प्राथमिकताएं तय कर रखी थी। भारत ने युद्ध से तबाह हो रहे यूक्रेन में अपने फंसे नागरिकों को निकालने की योजना बनाई। सुरक्षित निकासी के लिए ऑपरेशन गंगा शुरु हुआ। ऐसा निकासी अभियान दुनिया में पहले न देखा गया, न अंजाम दिया गया। रूस की दुनिया भर में आलोचना होती रही। भारत की निगाहें ऑपरेशन गंगा पर टिकी रही। जंग के बीच 20 हजार भारतीय नागरिक फंसे थे। ऐसे कठिन काम को भारत ने अंजाम पर पहुंचाया। पूरी दुनिया देखती रह गई।

 

 

OPERATION GANGA BYTES

 

VO 14 < भारत ने पहुंचाई मानवीय सहायता >

 

--यूक्रेन के युद्धग्रस्त क्षेत्रों से भारतीयों की निकासी जोरों पर थी।

 

भारत केवल जंग में जुटे देशों के प्रमुखों से बात और यूक्रेन में फंसे अपने लोगों को निकालने में ही नहीं लगा हुआ था। उससे भी ज्यादा जरूरी भारत उन चंद देशों में से था जिसने यूक्रेन को मानवीय सहायता भेजी। सहायता के तौर पर दवाएं, तंबू और अन्य जरूरी चीजों को भेजा गया। 

 

 

 

 

VO 15 < सुरक्षा परिषद में भारत का साफ रूख > BYTE FROM PREVIOUS

 

जनमत संग्रह के बीच हुए घटनाक्रम की आंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक भी पहुंची। ( शुक्रवार, 30 सितंबर) भारत ने कब्जे के खिलाफ निंदा प्रस्ताव से दूरी बनाई रखी। पहले भी भारत ने संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर वोटिंग से तीन बार दूरी बनाए रखी।

ये एक साहसिक कदम था। कई मौकों पर भारत ने अपने रूख को साफ किया।

 

OLD BYTE plus  NEW BYTE KAMBOJ 30 sept 2022

 

 

 

 

 

BRIDGE 3 

 

भारत ने खुले तौर पर अपना रूख रखा। अपने हितों के अनुसार फैसले लिए। भारत का रूख काफी साफ था। भारत के बढ़ते प्रभाव के कारण इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत, कुछ विश्व शक्तियों के इशारे पर चलने को तैयार नहीं है। अमेरिका और उसके सहयोगी जैसा चाहते हैं वैसा हो- इसके दिन भी लद गए। बदलती स्थिति को समझने की जरूरत है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने इस बात को साबित भी कर दिया है।

 

 

 

VO 16<< भारत को उपदेश की जरूरत नहीं >

        

         

......... महीने की दौरान दुनिया के कई बड़े नेताओं के दौरे से दिल्ली में राजनयिक सरगर्मियां तेज हो गई थी। कईयों ने तो भारत आने की घोषणा भी नहीं की थी। यूरोपीय संघ के अधिकारी भी उन दर्जन भर से ज्यादा विदेशी राजनयिकों में शामिल थे जिन्होंने भारत का दौरा किया।        

 

बाइट- डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री

 

SLUG - < भारत का दक्ष और संतुलित रवैया >

VO-17-

 

यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को दो प्रमुख गुटों में बांटा दिया है। इसमें ज्यादातर पश्चिमी देश शामिल है। ये भी सामने आया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत पर सबका ध्यान खींचा चला आया। भारत ने तटस्थ रहने की नीति अपनाई। लेकिन क्या भारत को इस नीति पर चलने से रोका गया। यूरोप और अमेरिका के कुछ प्रमुख लोगों ने भारत को तटस्थता की नीति से दूर करने की कोशिश की ताकि भारत पश्चिमी देशों के गुट में शामिल हो सके।   

 

 

(PICK VO VISUALS FROM INDIA ON HIGH TABLE)

. MODI BYTES /QUOTES INDIA FOR PEACE(EARLIER DOC)

 

 

VO 18<- भारत और यूरोपीय संकट की नैतिकता

 

भारत के लिए अपना हित सर्वोपरि है। भारत का रूख साफ था- यूरोपीय संकट की नैतिकता में भारत को नहीं फंसना नहीं था। भारत ने अपना रास्ता चुना... भविष्य का रास्ता चुना। जैसे जैसे जंग तेज होती जा रही थी, वैसे वैसे ये स्पष्ट हो रहा था कि इस मामले में भारत का रूख न केवल देश के हित में है ब्लिक ये नैतिक और संतुलित भी है।

 

BYTE EXPERT

 

 


VO 19
< युद्ध के बाद भारत की अहम भूमिका >

 

यूक्रेन संकट खत्म होने के बाद नई परिस्थितियों में भारत एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। रूस और यूक्रेन के बीच केवल समझौता नहीं होगा बल्कि रूस और पश्चिमी देशों के बीच भी बड़ी समझ सामने आएगी जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यूरोप में शांति और स्थिरता बहाल करने में भारत सक्षम होगा। 

 

 

Byte 

Expert

 

 VO 20. Vo< भारत के लिए आगे का रास्ता >

 

भारत के आगे बढ़ने का रास्ता सामने आया है। भारत के प्रधानमंत्री ने बौद्धिक और कूटनीतिक तरीके से अपने रुख को और अधिक साफ किया है। इसमें जरूरत पड़ने पर अमेरिका और कई बड़े पश्चिम देशों को आईना दिखाना शामिल है। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है। अब ये साफ हो चुका है कि दुनिया को भारत की पहले से कहीं ज्यादा जरूरत है। एक ऐसा भारत जो कि मजबूत है, स्थिर है और लचीले रूख वाला है जो कि नेतृत्व करने को तैयार है। 

 

 

Bytes experts 

 

Conclusive ptc 

 

भारत विश्व शक्ति बनने में सक्षम है। नई विश्व व्यवस्था धीरे-धीरे सामने आ रही है। पूर्वी देश नई विश्व शक्ति बनने की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में भारत अपने राष्ट्रीय हितों के साथ मजबूती से खड़ा है। पहले से भी कहीं मजबूत। भारत आत्मनिर्भर होने के प्रयासों को तेजी से बढ़ा रहा है। फिर रणनीतिक रूप से स्वतंत्र होने से कोई नहीं रोक सकता। ऐसे समय में जब दुनिया पर परमाणु युद्ध का खतरा मंडरा रहा है— प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत बदलती विश्व व्यवस्था में साफ संदेश दे रहा है। भारत को किसी और की जरूरत नहीं है। भारत अपना पक्ष ले सकता है। कोई भी बाहरी शक्ति अपनी राय नहीं थोप सकता। भारत को किसी सलाह या मश्विरे की जरूरत नहीं..... भारत का मतलब देशहित पहले। इस पर कोई समझौता नहीं। भारत अब अपना खुद भाग्य विधाता है।

 

 

बुधवार, 21 जनवरी 2026

विशेष आर्थिक क्षेत्र

( 2006 में लिखा गया आलेख जब पत्रकारिता का कोर्स जारी था) 



'विशेष औद्योगिक क्षेत्र' ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों को कहा जाता है तो निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उदार आर्थिक नीतियों और उत्तम ढांचागत सुविधाओं से संपन्न होते है। यह क्षेत्र आमतौर पर नियातोन्मुखी होते हैं और जिनमें देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए खास क्षमता होती है। सरकार द्वारा निर्धारित करों में कई प्रकार की छूट दी जाती है और आवश्यकतानुसार श्रम कानू‌नों में भी ढील दी जाती है। चीन के विशेष आर्थिक क्षेत्रों से प्रेरणा लेकर, 1 अप्रैल 2000 से प्रभावी एग्जिम नीति में 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' योजना लागू‌ की गई। सरकार ने पूर्व के सभी 8 निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों- कांडला और सूरत (गुजरात) सांताक्रूज (महाराष्ट्र), कोच्चि (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु) नोएडा (उतर प्रदेश) फाल्टा (प. बंगाल) और विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) को सेज में परिवर्तित कर दिया। 23 जून 2005 को संसद ने 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' को विधेयक पारित कर कानून बना दिया तथा 10 फरवरी 2006 से विशेष आर्थिक जोन अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम के तहत SEZ में स्थापित इकाईयों के लिए एकल खिड़‌की से सभी प्रकार की स्वीकृति प्राप्त हो सकेगी। साथ ही, इन इकाइयों को विभिन्न प्रकार की छूटे प्रदान की गई है तथा ऑफशोर बैंकिंग इकाइयों की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है। इस अधिनियम के अन्तर्गत जारी नियमावली के अनुसार यथासंभव अनुपजाऊ और बंजर भूमि का उपयोग करते हुए कम से कम 10 हेक्टेयर (24 एकड़) पर सॉफ्टवेयर तथा बायोटेक्नोलॉजी जैसे छोटे व्यवसायों को तथा अधिकतम 1000 हेक्टेयर भूमि पर बहुउत्पाद उद्योगों और व्यावसायों को आवासीय क्षेत्र, अस्पताल, शॉपिंग सेंटर तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था के साथ भी सम्मिलित एक या कई उद्यमियों द्वारा समिालित रूप से विकसित किए जाने के प्रावधान रखे गये है। इस अधिनियम के अन्तर्गत किसी भी निजी, सार्वजनिक तथा संयुक्त क्षेत्र द्वारा SEZ की स्थापना की जा सकती है। विदेशी कंपनियों को भी SEZ स्थापित करने की छूट है। इस हेतु इन्हें 100 प्रतिशत तक FDI की छूट दी गई है। वाणिज्य मंत्री के अनुसार आगामी तीन वर्षों (2016-09) के दौरान 1 लाख करोड़ रुपये का निवेश इन क्षेत्रो से अपेक्षित है, जिससे रोजगार के 5 लाख अवसर सृजित हो सकेंगे। सितम्बर 2006 तक सरकार ने कुल मिलाकर 267 SEZ को स्वीकृति दी जिनमें से 130 को औपचारिक तथा 117 को सैद्धांतिक तौर पर स्वीकृति दी गयी है। इनको स्थापित करने से पहले सरकार, स्थापन कर्ता तथा भूमिवासी के बीच एक समझ कायम होना ही इसको एक मजबूत आधार देता है।

शनिवार, 26 जुलाई 2025

AI के दौर में पत्रकारिता का नया चेहरा

 


(एक पत्रकार की नजर से, जहां टेक्नोलॉजी और सच्चाई आमने-सामने हैं)


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब पत्रकारिता का भविष्य नहीं, उसका वर्तमान है। ये न्यूज़रूम में दस्तक दे चुका है। कहीं हेडलाइन सुझा रहा है, कहीं खबरों की भाषा सुधार रहा है और कहीं-कहीं तो पूरी रिपोर्ट भी खुद ही लिख रहा है। ये एक तरफ जहां एक शानदार साथी है, वहीं दूसरी ओर एक संभावित खतरा भी है। इस बदलती दुनिया के बीच खड़ा मैं, AI को सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि हमारे पेशे की आत्मा के लिए एक कसौटी मानता हूं।


हां, AI क्रांतिकारी है। यह रिपोर्टिंग को तेज करता है, रिसर्च में मदद करता है, भारी-भरकम डेटा चंद सेकंड में छान देता है, और जब डेडलाइन सर पर हो तो तेजिंदर खबर भी बना देता है। ये पत्रकारों का बोझ हल्का करता है। लेकिन AI खुद पत्रकार नहीं है। वो न तो किसी आहट को समझ सकता है, न आवाज की थरथराहट को, और न ही किसी युद्ध क्षेत्र की चुप्पी का बोझ महसूस कर सकता है। वो राजनीति की परतों को नहीं पढ़ सकता, न ही किसी हेडलाइन के असर को पहले से भांप सकता है। ये सब इंसानी संवेदनाएं हैं।


कुछ भले ही कहें कि पत्रकारिता खतरे में है, पर मैं अब भी आशावादी हूं। पत्रकारिता खत्म नहीं हो रही, वो खुद को नए सांचे में ढाल रही है। असली संकट तो उन क्षेत्रों में है जो पूरी तरह प्रोसेस आधारित हैं—जैसे IT या बैंकिंग। लेकिन पत्रकारिता दिल और दिमाग से चलती है। जिज्ञासा, अनुभव और निर्णय की भावना से चलती है और ये सब कोई एल्गोरिदम नहीं सीख सकता, न अभी, शायद कभी नहीं।


फिर भी खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शुरुआती स्तर की नौकरियां जैसे सब-एडिटिंग, प्रूफरीडिंग या बेसिक न्यूज कलेक्शन, अब ऑटोमेट हो रही हैं। हर घंटे नई खबर देने का दबाव ऐसा माहौल बना रहा है जहां गहराई से ज्यादा रफ्तार को तवज्जो दी जा रही है। इसी जल्दबाज़ी में सनसनी फैलती है, और नैतिकता की कसौटी कमजोर पड़ने लगती है। अगर AI को बिना निगरानी के इस्तेमाल किया जाए, तो ये हालात और भी बिगड़ सकते हैं।


AI को मदद के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए, सहारा  नहीं बनाना चाहिए। इसमें संपादकीय समझ की कमी है। उसे नहीं पता कि कौन सी खबर रोकी जानी चाहिए, कब शब्दों से ज़्यादा चुप्पी जरूरी है। वो सत्ता से सवाल नहीं कर सकता, न ही किसी सूत्र की पहचान की रक्षा कर सकता है। ये काम सिर्फ एक पत्रकार ही कर सकता है। याद रखना ज़रूरी है: AI पत्रकारिता नहीं है। ये एक औज़ार हो सकता है, लेकिन इंसान की ईमानदारी की जगह नहीं ले सकता।


आजकल न्यूज़रूम में एल्गोरिदम, ट्रेंडिंग कंटेंट और "क्या वायरल होगा" का बोलबाला है। छोटे वीडियो, रील्स ये खबर को तेजी से दिखा सकते हैं, लेकिन गहराई से समझा नहीं सकते। स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए खबरें आंखों से तो गुजरती हैं, लेकिन दिमाग तक नहीं पहुंचतीं। हां, लोग लगातार देखते हैं, पर असली जुड़ाव अब भी अच्छी क्वालिटी पर ही निर्भर करता है, मात्रा पर नहीं।


AI का स्याह पक्ष भी है। इसे प्रोपेगेंडा फैलाने, बॉट्स से कमेंट भरने और टार्गेटेड नैरेटिव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ये अनजाने में गलत या भ्रामक जानकारी फैला सकता है, क्योंकि मशीन सच को इंसान की तरह नहीं समझती। और अगर गलती हो जाए, तो जिम्मेदारी कौन लेगा—AI या उसे इस्तेमाल करने वाला पत्रकार?


इसीलिए पारदर्शिता जरूरी है। AI का इस्तेमाल सही तरीके से, संपादकीय निगरानी में होना चाहिए। जब मशीन काम करे तब भी जवाबदेही इंसान की ही होगी। डेटा में छिपे पूर्वाग्रह, संदर्भ की कमी या किसी आउटपुट की गलती—इन सबकी जांच और सुधार इंसान ही कर सकता है। जैसे पहले था, आज भी सच सबसे ऊपर है। हमारा काम सिर्फ सच तक पहुंचना नहीं, बल्कि उसे बचाए रखना भी है।


और सबसे जरूरी बात कोई भी AI न सत्ता से जवाब मांग सकता है, न गलती के लिए माफी मांग सकता है, और न ही जनता का भरोसा जीत सकता है। ये सिर्फ एक पत्रकार ही कर सकता है।


तो अब आगे क्या हो सकता है? हमें पत्रकारिता को छोड़ना नहीं है, उसे नया रूप देना है। AI को सहायक बनाएं, उसकी ताकत का इस्तेमाल करें जैसे रिकॉर्ड खंगालना, ट्रेंड्स को समझना, शुरुआती ड्राफ्ट तैयार करना लेकिन असली कहानी में जान इंसान ही डालेगा। हमें उन चीज़ों पर ध्यान देना होगा जो मशीन कभी नहीं कर सकती जैसे संवेदनशीलता, ज़िम्मेदारी और नैतिकता।


और सबसे अहम बात ये है कि हमें रफ्तार और गहराई के बीच फर्क समझना होगा। जो क्लिक हो जाए, और जो भरोसा जीत ले इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर होता है क्योंकि पत्रकारिता का अस्तित्व सिर्फ तकनीक पर नहीं, भरोसे पर टिका है।


अंत में ये विचार सारगर्भित है कि हमें AI से डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन उसका इस्तेमाल करते वक्त ये कभी मत भूलिए कि हम कौन हैं।

Reinventing Journalism in the Age of AI

 

(By a journalist reflecting on the crossroads of technology and truth)


Artificial Intelligence in journalism is no longer a concept of the future. It is here-buzzing in newsrooms, editing lines, recommending headlines, and sometimes even writing entire stories. It’s both a remarkable ally and a potential disruptor. And as someone within the heart of this evolving industry, I see AI not just as a tool, but as a test of our profession’s soul.


Yes, AI is revolutionary. It accelerates reporting, supports research, sifts through vast datasets in seconds, and even drafts quick news blurbs when deadlines are breathing down your neck. It helps reduce the grunt work for journalists. But AI is not a journalist. It cannot feel the nuance in a sigh, the tremble in a voice, or the weight of silence in a war zone. It cannot read between political lines or predict the ripple effect of a headline. That remains firmly human.


Despite what some headlines scream, I remain optimistic. Journalism is not dying. It is adapting. In fact, the real existential crises lie elsewhere, in IT and in banking, industries more mechanical and process-driven. Journalism, by contrast, thrives on human curiosity, instinct, and judgement. These can’t be encoded in an algorithm... not yet, and maybe never.


Still, we can’t pretend there’s no threat. Entry-level roles like sub-editing, proofreading, or basic news aggregation are increasingly automated. The pressure to churn out fresh content every hour has created a culture of speed over depth. In this rush, sensationalism creeps in. Ethics are tested. And AI, when unchecked, only intensifies this.


There’s a real danger in using AI as a crutch rather than a companion. It lacks editorial judgement. It doesn’t know when a story shouldn’t be published. It cannot question power or protect a source. These are core duties of a journalist. We must remember: AI is not journalism. Tools may assist, but they do not replace integrity.


In the modern newsroom, there’s growing reliance on algorithms, content trends, and "what will go viral." Shorts and reels break the news faster than bulletins ever could, but they rarely break it down. Depth and context get lost in the scroll. People binge-watch, yes, but meaningful engagement still depends on quality, not quantity.


There are darker sides too. AI can be manipulated to generate propaganda, flood comments with bots, or micro-target polarized narratives. It can unintentionally spread misinformation, simply because it doesn’t understand truth the way humans do. And if AI makes a mistake, who’s responsible—the machine or the journalist who used it?


This is where transparency becomes non-negotiable. AI must be used ethically, with editorial oversight. Journalists must be held accountable, even when a machine is involved. Bias in training data, lack of context, or errors in output must all be traced, checked, and corrected. As always, facts are sacred. Our job is not just to chase them but to protect them.


Let’s also be clear: no AI can hold power to account, apologize for an error, or earn public trust. Only a human journalist can do that.


So where do we go from here?


We must reinvent journalism, not surrender it. Use AI to assist reporting, not replace it. Let it do the heavy lifting like scanning records, analyzing trends, drafting base copy but let humans bring the story to life. Let us focus on what machines can't replicate: instinct, empathy, accountability.


Most importantly, we must draw a line between speed and substance. Between what is clickable and what is credible. Because the survival of journalism isn’t just about technology, it’s about trust.


Final thought: We shouldn’t fear AI. But we must never forget who we are in the process of using it.

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

क्रिकेट विश्व कप फिर से ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में

23 साल बाद क्रिकेट विश्व कप का आयोजन ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में फिर से होने जा रहा है। 1992 में जब पहली बार दक्षिणी गोलार्द्ध में क्रिकेट विश्व कप का आयोजन हुआ था, तो काफी चीज पहली बार हो रही थी। पहली बार रंगीन कपड़ों में क्रिकेट टीमों का मैदान पर आना, उजले क्रिकेट बॉल और काले साइडस्क्रीन का प्रयोग होना- इस विश्व कप के खास आकर्षणों में से था। फ्लड लाइट की दूधिया रोशनी में मैचों का आयोजन होना और फील्डींग रेस्ट्रीकशन का लगना भी पहली बार विश्व कप में हुआ था। एक नई टीम दक्षिण अफ्रीका का उस वक्त एक लंबे अंतराल के बाद आना- अजीबोगरीब लगा था, लेकिन इस नई टीम ने आने के साथ अपने शानदार प्रदर्शन से विश्व कप में बड़ी-बड़ी टीमों को बुरी तरह से डरा दिया था। सेमीफाइनल में बारिश के कारण 13 गेंद में 22 रन के बदले मिले नए लक्ष्य 1 गेंद में 21 रन ने जहां दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट प्रेमियों को निराश किया वहीं एक नए नियम की ओर सोचने के लिए मजबूर किया, तब जाकर कहीं डकवर्थ-लुईस नियम का जन्म हुआ।

अपने कई नए अनोखे प्रयोगों के कारण 1992 के विश्व कप ने क्रिकेट प्रेमियों को अपनी ओर खींचा था, वहीं 2015 में होने वाले विश्व कप पर क्रिकेट प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करने का खासा दबाब रहेगा। 23 साल में परिस्थितियां काफी बदली है। अब टी-20 विश्व कप, आईपीएल और ऐसी ही कितनी क्लब प्रतियोगिताओं ने दर्शकों को अपनी ओर खींचा हैं। दर्शकों को तीन घंटे में मैच का परिणाम देखने को मिल जाता है। कुछ नए नियम, कुछ नए प्रवर्तन ही विश्व कप को रोचक बना सकते है।

1992 विश्व कप प्रतियोगिता में पहली बार न्यूजीलैंड ने जहां स्पिनर से गेंदबाजी का आगाज करवाया, वहीं सलामी बल्लेबाज के द्वारा आतिशी खेल की शुरूआत की नींव भी इसी विश्व कप में मार्क ग्रेटबैच के द्वारा रखी गई। न्यूजीलैंड के सलामी बल्लेबाज के रूप मिले मौके को मार्क ग्रेटबैच ने काफी भुनाया।


विश्व कप में पहली बार राउंड रॉबिन लीग को हटाकर लीग राउंड में सभी देशों को एक-दूसरे से भिड़ना पड़ा। जिसका खामियाजा अच्छी टीमें को भुगतना पड़ा और अंततः पाकिस्तान चैंपियन बनकर उभरा।