बुधवार, 11 मार्च 2026

दुर्गा पूजा

 

 

1.     दुर्गा भगवती का निर्माण ही चूँकि सभी देवों को मिलाकर सम्यक रूप में हुआ, तो इसमें संगीत के सभी रस दिख जाते हैं। करुणा से वीर और भयानक रसों तक।

2.       मृदंग और पखावज का उपयोग दो कारणों से अधिक। एक तो यह कार्नाटिक और ध्रुपद संगीत में अधिक गाया जाता रहा। मंदिरों में, या अन्यथा भी। दूसरा कि पद अविचल और continuous beats में हैं।

3.       रागों में समय-प्रहर के हिसाब से लोग गाते रहे हैं। लेकिन, कोई राग अछूता नहीं। भोर में भैरवी या उदय नवचंद्रिका (कार्नाटिक) तो रात में केदार तक। राग दुर्गा तो अपने-आप में ही अद्भुत है।

4.       सईदुद्दीन डागर इसके विषय में बेहतर समझाते हैं कि इसकी गायकी ही ऐसी है कि हम भगवती से विनती करते हैं, और वह जब आती हैं, तो सिंह जैसे डोलते हुए आते हैं वैसे ही हमारे स्वर डोलने लगते हैं।

5.       पटना में एक समय में दुर्गा पूजा में पूरे देश के संगीतकार जुटते थे। आज जैसे एक समय में पचास फेसबुक लाइव चलते हैं, वैसे पटना में जगह-जगह पंडालों में पं. भीमसेन जोशी से किशोरी अमोनकर तक आते थे।

6.       अमजद अली ख़ान एक बात-चीत में याद करते हैं कि पटना के दुर्गा पूजा जैसा संगीत वातावरण कभी नहीं देखा। उसमें होता था कि अंत होगा तो राग दुर्गा से। लेकिन, वह करेगा कौन? उसके लिए बिस्मिल्लाह ख़ान और वी. जी. जोग अपना जगह छेक कर रखते थे कि दुर्गा तो वही गाएँगे।

7.       नब्बे के दशक में लफंगों ने किशोरी अमोनकर की हूटिंग कर दी कि ‘यह क्या ऐ ऐ लगा रखा है’। उसके बाद से उन्होंने आना छोड़ दिया, और यह परंपरा भी खत्म हो गयी।

8.       बंगाल का चंडी-पाठ हो, दक्षिण का आयुध महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् पाठ, या मिथिला का भैरवी (विद्यापति), या विलायत ख़ान साहब के सितार पर गुनगुनाते ‘भवानी दयानी’, दुर्गा में भिन्न-भिन्न छटा दिखेगी।

9.       ऋत्विक घटक अपनी फ़िल्म ‘मेघे ढके तारा’ में आदिवासी छऊ नृत्य के साथ एक और संदेश देते हैं कि यहाँ के लोग न जाने कब से ‘माँ’ के लिए यह नृत्य कर रहे हैं। उन्हें स्तोत्र का ज्ञान नहीं, और उनके लिए बस ‘माँ’ है जो कभी भी उनकी ही भाषा में बुलाने पर आ जाती है।

10.   तो इस हिसाब से दुर्गा वैदिक काल या मानव सभ्यता से भी पहले मातृ-रूप में पूजित है। यह नैरेटिव महिषासुर के नव-आदिवासी नैरेटिव से भिन्न है। माँ और असुर दोनों ही लोक के ही थे, प्रकृति के ही।

11.   नवदुर्गा नवरसी दुर्गा कही जा सकती है। हम जिस मूड में हैं, उसी में एक दुर्गा समक्ष है। इनको एकरूपी या एकरस देखने से दुर्गा को संकीर्ण करना है। उनका वाहन सिंह भी एक दिशा में अवलोकन नहीं करता, बल्कि पीछे मुड़-मुड़ कर देखता है कि कोई रह तो नहीं गया।

12.   सिंहावलोकन... यही बातें संगीत में भी आवृति और स्वरों के मूरन-घूरन चक्र रूप में झलकती रहती है और घरों में दुर्गा सप्तशती भी आवृत्त में ही पढ़ते हैं।

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