शुक्रवार, 6 जनवरी 2012
वापस आ रहा हूं..
मंगलवार, 9 मार्च 2010
हॉकी का हाशिये पर जाना.......

भारतीय हॉकी टीम का समर्थन करने वाले घरेलू दर्शकों को एक मैच की जीत के बाद बाकी मैचों में हार के कारण निराशा का सामना करना पड़ा। हालांकि विश्व कप के दौरान दर्शकों की भीड़ जुटाने के लिए आयोजकों द्वारा एड्-कैंपेन चलाया गया था। क्रिकेटर विरेन्दर सहवाग, अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और शूटर राजवर्धन सिंह राठौड़ का सहारा लेना पड़ा, वो भी देश के राष्ट्रीय खेल के लिए भीड़ जुटाने के लिए- ये अपने आप में खेल के प्रति दर्शकों की उदासीनता का प्रतीक है और तो और, अभी तक विश्व कप के दौरान बाकी मैचों में दर्शकों की उपस्थिति भी काफी कम ही दिखी। दर्शक-दीर्घा में मुख्य रूप से विदेश में रहने वाले भारतीय लोगों ने ही मैच देखने में रूचि दिखायी। कुछ पूर्व हॉकी खिलाड़ियों ने भी मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम में आकर अपने ही देश में अपने खेल का बुरा हाल होते देखा और साथ ही हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के बूत को स्टेडियम के बाहर देख पुरानी सुनहरी यादों को कुछ पल के लिए याद किया।
पिछले दो साल से भारतीय हॉकी के साथ जो बाहरी खेल खेला जा रहा है- ये बात किसी से छुपी नहीं है। अच्छे खेल प्रशासक की कमी से जूझता राष्ट्रीय खेल भले ही अपने इतिहास पर गर्व कर ले, लेकिन कब तक इतिहास की सुनहरी यादों के भरोसे ही भविष्य की तस्वीर बनाते रहेंगे।
भारतीय टीम को एक पेशेवर कोच के रूप में स्पेन के कोच होसे ब्रासा को नियुक्त करने की सलाह अंतर्राष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन के अध्यक्ष लिनदरो नेग्रे ने ही दिया था, लेकिन वो भी कुछ कमाल ना दिखा सके। वैसे इससे पहले दो साल के भीतर टीम इंडिया ने दर्जनों कोच को आजमा कर देख लिया था। स्पेन की महिला टीम को ओलंपिक चैंपियन बनाने वाले ब्रासा से करिश्मे की उम्मीद तभी करनी चाहिए थी जब अपने खिलाड़ी खेल को खेल की तरह खेलते।
कुल मिलाकर भारतीय टीम ने विश्व कप के दौरान अपने खेल से खेल-प्रेमियों को निराश ही किया। सेमीफाइनल में ना पहुँचने की टीस को आगामी राष्ट्रमंडल खेल के दौरान अच्छा खेल खेलकर दूर किया जा सकता है और इसके लिए टीम के पास अभ्यास करने के लिए अच्छा समय भी है और मौका भी। अगर टीम अपना पुराना गौरव हासिल करना चाहती है तो पौराणिक फिनिक्स पक्षी के भांति अपनी राख से ही फिर से उत्पन्न होना होगा।
सोमवार, 8 मार्च 2010
महिला दिवस के दिन भी महिला आरक्षण कानून करता रहा इंतजार
बिल का अस्तित्व में आना- संसद और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं को 33.3 प्रतिशत आरक्षण देने वाला यह विधेयक एच.डी.देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा (यूनाईटेड फ्रंट ) सरकार के कानून मंत्री रमाकांत खलफ ने 12 सितंबर 1996 को लोकसभा में पेश किया था। इसे वाम नेता गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया। इस बिल को संसद में कई बार पेश किया गया था लेकिन आज तक पारित नहीं किया जा सका है। गुजराल सरकार के कार्यकाल में उनके अपने ही दल के सदस्यों ने इसका विरोध किया। एनडीए शासनकाल में भी बिल को दो बार - 1998 और 1999 में संसद में पेश किया गया, लेकिन इसे कामयाबी हासिल ना हो सकी। 1999 में तो तब के कानून मंत्री राम जेठमलानी ने जब इस बिल को पेश करना चाहा तो राजद के एक सांसद ने बिल को उनके हाथ से छीन लिया। इसी तरह जब 2008 में कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने राज्यसभा में लाना चाहा तो उन्हें कांग्रेसी नेता वी। नारायणसामी और रेणुका चौधरी ने घेर लिया था ताकि यह घटना फिर ना दोहरायी जा सके।
बिल के प्रावधान- इस बिल के आने से विधायिका के सभी स्तर- लोकसभा, राज्य विधान सभा से लेकर स्थानीय निकाय तक तीनों स्तर में महिलाओं को 33।3 प्रतिशत आरक्षण मिल जाएगा। अगर यह बिल पारित हो जाएगा तो राष्ट्रीय , राज्य और स्थानीय स्तर पर विधायी स्तर पर सभी उपलब्ध सीटों का एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएगा। इसमें एक-तिहाई आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के महिलाओं के लिए भी होगा।
आज राज्यसभा में भी बिल पेश करने के दौरान कुछ सांसदों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। इस बिल का विरोध करने वाले दलों को इस बात का डर है कि अगर इसे वर्तमान स्वरूप में पास किया गया तो उनके कई नेताओं को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल सकेगा। पिछड़े और कमजोर तबकों से आनेवाले नेताओं का मानना है कि यह बिल सिर्फ उच्च वर्ग की महिलाओं को ही फायदा पहुँचायेगा।
लेकिन इसका समर्थन करने वालों का मत है कि इससे संसद में लिंग-समानता को बढ़ावा मिलेगा। वैसे भी भारत में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है और इस प्रकार मिलनेवाली राजनीतिक सहभागिता उनकी स्थिति में व्यापक सुधार लाएगी, साथ ही साथ अब तक उन्हें जो भेदभाव का सामना और असमानता देखी है उससे लड़ने में मदद मिलेगी।
बृहस्पतिवार, 25 फरवरी 2010
Sachin Ton(dual)kar
सचिन २०० नॉट आउट..... दिल तो बच्चा है जी

ग्वालियर के रूपसिंह स्टेडियम में सचिन तेंदुलकर ने 50 वें ओवर की तीसरी गेंद पर जब दौड़ कर एक रन लिया.. तो 39 साल से चला आ रहा क्रिकेट-प्रेमियों का एक बड़ा सपना पूरा हो गया- वन-डे क्रिकेट में किसी एक खिलाड़ी के बल्ले से 200 रन बनने का सपना। और जब यह कारनामा क्रिकेट के भगवान... और ना जाने किन-किन विशेषणों से अलंकृत...... सचिन तेंदुलकर के बल्ले से हुआ तो क्रिकेट प्रेमियों ने राहत की साँस ली। अभी हाल में ही ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 175 रन की पारी खेलने वाले सचिन से यह उम्मीद उनके उम्र के 37वें पड़ाव में करना इतना आसान नहीं था। पिछले साल ही जिम्बाब्वे के चार्ल्स कोवेंटरी ने जब सईद अनवर के सर्वाधिक व्यक्तिगत स्कोर का रिकार्ड की बराबरी करते हुए अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज कराया था... तब भी यह एक सपना ही था।
तेरह साल पहले 1997 में सईद अनवर ने भारत के खिलाफ 194 रन का रिकार्ड बनाया था। उससे पहले भी यह रिकार्ड भारत के खिलाफ तेरह साल पहले विवियन रिचर्ड ने 1984 में 189 रन बनाकर स्थापित किया था।
194 रन का रिकार्ड तो लिटिल मास्टर ने 46वें ओवर में ही तोड़ दिया था, उसके बाद सबकी नजर उन रनों पर थी जिसे इतिहास के पन्नों में दर्ज होना था। ऐसे वक्त में एक या दो रन लेकर 200 तक पहुँचना- जितना हमारे लिए सुकून पहुँचाने वाला था, उतना ही मास्टर ब्लास्टर के लिए भी। फिर तो शुरू हो गया बधाई देने का सिलसिला। मोबाइल पर संदेश आने लगे। निजी खबरिया चैनलों के लिए तो रेल बजट पर सचिन का 200 रन की बोगी भारी पड़ गयी। यह अलग बात है कि ममता दीदी ने भी सचिन को बधाई दी, लेकिन सचिन ने अखबार की सुर्खियों से लेकर टीवी चैनल की लीड स्टोरी सभी जगह ममता बनर्जी की बजट की छुट्टी कर दी।
खेल के प्रति इतना जुनून निश्चय ही आने वाली पीढ़ी के युवा खिलाड़ी के लिए पाना एक कठिन चुनौती होगी। सचिन का 20 वर्षों तक खेलना... यह भी अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है। श्रीकांत, कपिल देव और रवि शास्त्री से लेकर आज के दिनों में पदार्पण करने वाले युवा खिलाड़ी भी आने वाले दिनों में अपने पोते-पोतियों को बताया करेंगे कि मैं भी सचिन के साथ खेल रखा हूँ। सचिन के समकालिक खिलाड़ियों की सूची बनायी जाएगी तो यह इतनी लंबी होगी कि जिसमें विश्व के कितने खिलाड़ी आ जायेंगे। अब जब सचिन इतने अच्छे फार्म में है तो हमारा भी मन करता है कि वो अभी और खेले.. लेकिन वो भली-भाँति जानते है कि कब उन्हें बल्ला टाँगना है और कब उनकी फिटनेस लेवल उनका साथ नहीं देने वाली है।
अब कल की ही बात लीजीए.. जब 50 ओवर पूरे खेलने के बाद जब प्रेजेंटेशन सेरेमनी में कमेंटेटर रवि शास्त्री ने पूछा कि ऐसी इनिंग अब आप और खेलना चाहेंगे। तब सचिन ने कहा था कि 50 ओवर की ऐसी पारी खेलने का मौका मिला तो जरूर खेलूँगा। अब भी सचिन का दिल खेलने के बच्चा है। और जब तक ये बच्चा यूँ ही खेलते रहेगा.... खेल-प्रेमियों के लिए तो चाँदी ही चाँदी है।
( पिछली बार ग्वालियर के रूप सिंह स्टेडियम में सचिन शतक से चूके थे तो एक ब्लॉग लिखा था। अब जाकर इसी स्टेडियम में इतिहास लिखना, उस दर्द को भूलाने जैसा है। लिंक है- http://nisshabd.blogspot.com/2007/11/blog-post_16.html)
शनिवार, 28 नवम्बर 2009
कैट की परीक्षा को पहले ही दिन देना पड़ा टेस्ट
भारतीय प्रबंधन संस्थानों में प्रवेश के लिए इस परीक्षा में दो लाख चालीस हज़ार छात्र भाग ले रहे है. यह परीक्षा अमेरिका की एक कंपनी करा रही है. प्रोमीट्रीक नाम की कंपनी दस दिनों तक इस परीक्षा को कराएगी. पहले दिन ही जब यह आलम है, तो आगे क्या होता है, इसे देखते जाईयें. निश्चय ही ऑनलाइन परीक्षा कराकर हम एक कदम आगे हो रहे हैं, लेकिन उन छात्रों का क्या जो की कंप्यूटर से या तो परिचित नहीं हुए है या नए नए हैं इसे सीखने वाले. उनके लिए तो छोडिये, उन छात्रों को भी परीक्षा देने में समस्या आ रही थी, जो दिन भर कंप्यूटर पर डंटे रहते है. इसके लिए कम से कम एक माक टेस्ट होना चाहिए था.
पहले दिन पहले सत्र में जिन छात्रों ने परीक्षा दी हैं और उनके केंद्र पर सर्वर में किसी तरह की गड़बड़ी आयी है, तो अब इस बात पर यह निर्भर करता है कि उनके दिए गए जवाब रिकावर हो पाते है की नहीं. साथ ही साथ पहली बार हो रहे ऐसे टेस्ट को भी कई टेस्ट से गुजरना होगा.
शुक्रवार, 6 नवम्बर 2009
बर्लिन की दीवार के ढहने और सचिन के क्रिकेट का टावरिंग फिगर बनने के बीस साल....
शीत युद्ध के प्रतीक के रूप में खड़ी जर्मनी की दीवार का ढ़हना उस वक्त की निश्चय ही सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना थी। लेकिन सचिन का टेस्ट में 16 साल में डेब्यू करना यानि सबसे कम उम्र का टेस्ट खिलाड़ी होना ही उस वक्त की खासियत थी। अब क्या पता कि बीस साल बाद जब हम उस वक्त की दोनों घटनाओं को एक साथ देखते हैं तो पाते है कि सचिन अब उस दीवार की माफिक हो गये है, जिससे बड़ी दीवार क्रिकेट जगत में खड़ा करना अभी निकट भविष्य में खड़ी होना संभव तो नहीं दिखता है। बर्लिन में बीस साल बाद एकीकृत होने की खुशी एमटीवी यूरोप म्यूजिक एॅवार्ड के रूप में मनायी जाएगी, जिसमें पॉप स्टार बेयोंस और हिप हॉप कलाकार जेज अपनी-अपनी प्रस्तुति देंगे।
बीस साल के लंबे कैरियर में सचिन ने कल ही हैदराबाद में 175 रन की यादगार पारी खेली, अपना 45 वां शतक जमाया, एकदिवसीय मैचों में 17 हजार रन पूरे किए और जब खेल के बाद उनसे पूछा गया कि क्या है जो उन्हें अब तक खेलने को प्रेरित करता है, तो जवाब था खेल के प्रति पैशन। इसी पैशन के साथ जब पूर्वी जर्मनी में 4 नवंबर को दीवार का विरोध करने वालों ने मार्च किया, तो 9 नवंबर को दोनों देशों की सीमाएं एक-दूसरे के लिए खोल दी गयी, तब से लेकर आजतक एकीकृत जर्मनी की प्रगति को आप विश्व-पटल पर आसानी से देख सकते हैं।
सचिन के क्रिकेट-कैरियर में कितने ही 'फर्स्ट' और 'मोस्ट' शामिल है, जब वे अपना बल्ला टांगेंगे तब तक ना जाने ऐसे कितने ही 'फर्स्ट' और 'मोस्ट' इनके रिकॉर्ड शामिल हो जायेंगे। उसी प्रकार ही आधुनिक विश्व इतिहास (दूसरे विश्व युद्ध के बाद) में जहां देशों का विघटन होना आम बात है, वैसी स्थिति में किसी दो देशों का एकीकृत होना हमारे सामने तो 'फर्स्ट' घटना है और साथ ही साथ 'मोस्ट' यादगार घटना भी है।
सचिन यूँ ही अपना कद बढ़ाते रहे और जर्मनी का एकीकरण भी बाकी देशों के लिए आने वाले समय में मिसाल बने... ज्यादा से ज्यादा ये कामना तो हम कर ही सकते है।
बृहस्पतिवार, 29 अक्तूबर 2009
फाल्के पर फिल्म, वो भी जब सौ साल पूरे होने को हैं....
भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद को बनाने में दादा साहब फाल्के को किस-किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा- इस विषय को इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है। 1911 में फाल्के जब जर्मन जादूगर से सीखा हुआ जादू दिखाने का काम करते थे, इसी क्रम में वहां से भागते हुए एक टेंट में अंग्रेजों को कुछ नया नाटक या कुछ चीज देखते हुए देखा। बेटा के मना करने के बाद भी दो आना का टिकट खरीद पहली बार चलती हुई तस्वीरों को उजले पर्दे पर देखा। ईसा मसीह पर बनी फिल्म को देखकर वे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने भी भारतीय देवी-देवताओं को उजले पर्दे पर चलती चित्रों के माध्यम से दिखाने का निश्चय उसी वक्त कर लिया। इसी चीज ने उन्हें फिल्म बनाने की प्रेरणा दी।
इन चलती हुई तस्वीरों को समझने के बार-बार सिनेमा देखना, इसे सीखने के लिए पहले प्रोजेक्टर रूम में जाकर समझना, किताबों को खरीदना और यही जूनुन उन्हें लंदन ले जाता है। पूरे तथ्यों को कुछ कॉमेडी का पुट देते हुए फिल्म में काफी अच्छे तरीके से दिखाया गया है।इस नयी विधा को सीखने के लिए दादा साहब को किस किस तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा, इस चीज को इस फिल्म में भले ही दिखाया गया हो, लेकिन इस चीज पर सिनेमा जगत का ध्यान भारत में फिल्मों के 100 साल पूरे होने जा रहे है, तब यह चीज हमें देखने को मिल रही है।
ओसियान फिल्म फेस्टिवल के दौरान पॉपुलर डिमांड के कारण फिल्म की स्क्रीनिंग एक बार फिर से हुई, तब जाकर यह फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म खत्म होने के बाद तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभागार गूँज उठा। फिल्म के निर्देशक, निर्माता और मिस्टर और मिसेज की भूमिका निभाने वाले कलाकारों को मिलने वाला स्टैंडिंग ओवेशन इस बात को सिद्ध कर रहा था कि वाकई फिल्म काफी अच्छी थी। इस फिल्म ने उस दौर (1911-1930) को जीवीत कर दिया था, जिस वक्त भारतीय फिल्म की फैक्ट्री की नींव पड़ी और इसकी नींव को डालने वाले व्यक्ति की जीवटता को भी इस बखूबी से चित्रित किया कि यह फिल्म दर्शकों को बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं।


